हम सब का नित नए लोगों से मिलना होता है रोज ...
हर जाति धर्म के लोग मिलते है रोज..
हम किसी से व्यवहार या संबंध किस आधार पर कायम करते है ?
अगर कोई मुझसे यह पूछे कि आप कैसे किसी को पसन्द करते है या अच्छा व्यक्ति समझते है तो मेरा जबाब होगा कि मैं उस व्यक्ति के व्यवहार और सोच से अपना संबंध तय करता हूँ।
मुझे नही लगता कि जाति, धर्म या अन्य कोई फैक्टर होता है दो व्यक्तियों के व्यवहार के लिए...
बेसिकली हमारी जाति मानव की है और यही नेचुरल है, वास्तविक भी और शायद भविष्य भी..
भले ही आज सभ्यताओं, समुदायों का घोर द्वंद देखने को मिल रहा है पर आने वाले एक दो शताब्दी बाद ये चीजें गौण हो जाएंगी।
तब जाति नामक चीज की तो बिल्कुल वैल्यू नही रहेगी।
धर्म भी अपने सीमित रूप में रहेगा।
जाति और धर्म कभी भी मनुष्य का व्यवहार नही तय कर सकते, ऐसा होता तो किसी भी जाति विशेष के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता वर्तमान में सर्वाइव कर पाना...
जिस तरह से काम धंधे का स्वरूप बदल रहा है और नई नई तकनीकों का जीवन शैली में दखल बढ़ रहा है उससे यही होगा कि आपको कुछेक मौकों और जगहों को छोड़कर कही भी जाति और धर्म का स्वरूप नही दिखेगा।
आज वर्तमान समय में जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर जाति का उभार हो रहा है वह बहुत कम समय के लिए है।
बहुत जल्द लोग इनसे ऊब जाएंगे और फिर कुछ स्थायी मुद्दे ही रहेंगे बात करने को...
आईए जातिगत पहचान को भूलकर बिहार को एक नई पहचान दें।
जबतक जात पर अड़े रहेंगे, बिहार यही खड़ा रहेगा।
बिहार को बिहारियत के पहचान की जरूरत है।
शिक्षक अमित गौतम
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