इच्छाओं का टकराव संघर्ष को जन्म देता है। यह संघर्ष व्यक्तिगत हो सकता है, सामूहिक हो सकता है।
अपनी इच्छा को सर्वोपरि मानना या प्रमुखता देना ही असंतुष्ट होने का कारण है।
जिस तरह हम चाहते हैं कि हमारे व्यक्तिगत, पारिवारिक या पेशेवर जीवन में अपने हिसाब से काम हो उसी तरह सब चाहते हैं।
जितनी तीव्रता आपकी इच्छा में होती है, उतनी ही सामने वाली में होती है.. इसलिए कभी कभी सामने वाली की इच्छाओं का सम्मान करते हुए स्वीकार कर लेना चाहिए।
इससे बहुत बार संघर्ष या असन्तुष्ट होने से बचा जा सकता है।
आज का विचार
30-12-2021
अमित गौतम, गोपालगंज से
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