2005 में मैंने मैट्रिक पास किया, तब कोचिंग का जमाना नही था, हाई स्कूल में हरेक घण्टी में क्लास चलता था। घर पर पढ़ाई के नाम पर लालटेन के आगे पन्ने उलटते थे।
आखिरी के तीन महीने कोचिंग किये, फिर एग्जाम हुआ डबल शिफ्ट में, यानी एक दिन में दो दो पेपर.. गोपालगंज में उस समय के.के पाठक डीएम थे, जो उन्हें जानते है उन्हें पता है उनके नाम का मतलब।
फिर भी अपने स्कूल में प्रथम स्थान पर आया, हालांकि मैं दूसरे स्थान पर था पर मैथ के आदरणीय गुरुजी जो यूपी के थे उनकी बेटी भी फॉर्म भरी थी डायरेक्ट तो वह फर्स्ट पोजिशन पर आई थी।
पर स्कूल के रेगुलर स्टूडेंट होने के नाते हम खुद को फर्स्ट पोजिशन पर मानते हैं क्योंकि वह मोहतरमा वाइल्ड कार्ड एंट्री ली थी।
हालांकि उस समय जिओ और फेसबुक का चलन नही था तो हमको मीडिया बाईट नही मिला।
हम भी टोले में रसगुल्ला बांटकर खुश हो लिए।
खैर, मैट्रिक तो पास हुए लेकिन एक नम्बर से फर्स्ट डिवीजन रह गया मतलब 420 पर फर्स्ट डिवीजन था, हमारा आया था 419 नम्बर।
शायद एग्जाम में 420 नही किये थे इसलिए 420 नही आया।
उस समय रीचेक/स्क्रूटनी का ज्ञान नही था तो 419 ही रह गया।
दसवीं पास करने के बाद जब इंटर में एडमिशन की बात आई तो हम भी बाकी स्टूडेंट्स की तरह सोच लिए की मैथ नही पढ़ना है। कौन मेहनत करेगा भाई.. लेकिन बाबूजी का फरमान जारी हुआ कि पढ़ना है तो मैथ नही तो कुछ नही...
फिर अचानक एकदिन बाबूजी ने तय किया कि अब तुम्हे पटना जाना है इंटर की तैयारी के लिए.. हम तो अकबका गए कि हिंदी मीडियम लड़का कैसे कम्पीट करेगा भाई वँहा इंग्लिश मीडियम कोचिंग में..?
फिर गांव के चाचाजी जो वँहा सिविल सर्विस की तैयारी करते थे और उन्ही के साथ वँहा शिफ्ट होना था, उनसे अपनी शंका जाहिर किये तो उन्होंने कहा कि अरे चिंता न करो तीन महीने में तुम भी इंग्लिश मीडियम में शिफ्ट हो जाओगे।
उनकी बात मानकर हम भी 11 नवम्बर 2005 को पहुँच गए पटना के महेन्द्रू...
वँहा सबसे पहले फिजिक्स की कोचिंग में गए मुसल्लहपुर हॉट में।
इण्टरमीडिएट में पटना रहकर पढ़ने और गांव से शहर की नई दुनियां में एंट्री लेने की रोचक कहानी अगले पार्ट में.. जुड़िये इस लिंक से
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