नए बच्चे जिनका करियर शुरू होने ही वाला होता है, उन्हें मैं अक्सर कहता हूं कि काम ऐसा पकड़ो जिसमें कुछ सीखने को मिले, जिसे सीखकर तुम भी उस काम को कर सको..
क्योंकि अगर ऐसा नही किया तो उसी पोजिशन पर वही काम करते रिटायर हो जाओगे।
कुछ काम ऐसे होते है जिनमें आप दस साल भी लगे रहो, कोई ग्रोथ नही होगी, ऐसे काम बड़े आसान लगते है, नए स्टूडेंट्स ऐसे कामों को पसंद करते है।
जबकि कुछ काम जैसे, सेल्स/मार्केटिंग/लीड जनरेटिंग या किसी बिजनेस/दुकानदारी में हाथ बंटाना इत्यादि ऐसे होते हैं कि बहुत जल्द ग्रोथ होती है और आप मजदूर (Worker) से मालिक (Owner) भी बन सकते हो।
लेकिन ऐसे कामों को स्टूडेंट्स पसन्द नही करते।
सपोज कीजिए आप एक छोटे प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे है, दस साल पढ़ाकर भी क्या मिलेगा..?
स्कूल का मालिक नही बनोगे, नही न, हा एक दो साल पढ़ाकर स्कूल चलाना सीखना हो तो यूजफुल हो।
कुलमिलाकर आप जो भी काम करो, उसे इस मेंटेलिटी के साथ करो कि उस काम को, उस धंधे को, उस बिजनेस को आप कुछ सालों में खुद शुरू कर सको, अन्यथा सब बेकार होगा।
छोटी मोटी ऑफिसेस में काम करने से अच्छा है कि कोई दुकान पर कपड़े बेच लो, इलेक्ट्रॉनिक सामानों की मरम्मत सिख लो, ज्यादा बेहतर रहेगा।
बाकी नीचे इस कहानी को जरूर पढ़ें, मेरी बात साफ हो जाएगी 👇👇👇
कुछ दिन पहले मेरे एक बिज़नेसमैन दोस्त अब्दुल हकीम भाई ने मुझे एक शानदार कहानी सुनाई थी। जो हमारे वक़्त और मेहनत से मिलने वाले प्रोडक्ट्स और बायप्रोड्क्टस के बारे में हमें गहरी बात सिखाती है।
कहानी यह है कि- गांव से दो दोस्त राजू और मुन्ना शहर आते हैं और अपनी आजीविका चलाने के लिए मजदूरी ढूंढते हैं। मजदूरी के लिए वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर जाते हैं और वहां पर काम मांगते हैं। काम पर रखने वाला उन्हें 500 रुपये रोज़ पर रख लेता है। राजू कहता है कि ठीक है लेकिन मुन्ना कहता है कि आप मुझे 500 की जगह 400 ही दीजिएगा पर मेरी गुजारिश है कि आप मुझे मिस्त्री के पास का काम दें। काम देने वाला उसकी बात मान लेता है। तीन महीने तक दोनों दोस्त उस कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करते हैं, एक 500 रुपए रोज़ में और एक 400 में। तीन महीने बाद मुन्ना मिस्त्री का काम सीखकर मिस्त्री बन जाता है जबकि राजू अब भी मजदूर ही बना हुआ है।
अब मुन्ना दूसरी कंस्ट्रक्शन साइट पर मिस्त्री का काम मांगने जाता है। वहां पर काम देने वाला उसे कहता है कि 1000 रुपये रोज़ में हम यहां पर तुम्हें काम दे पाएंगे। वह फिर कहता है कि मुझे आप 800 दीजिएगा लेकिन मेरी एक गुज़ारिश है कि मुझे कुछ समय के लिए ठेकेदार के साथ रहने का मौका दिया जाए, सुबह आधा घंटा और शाम को आधा घंटा। काम देने वाला उसकी बात मान लेता है। अब वह यहां पर मिस्त्री का काम कर रहा है लेकिन साथ ही ठेकेदार के साथ रहकर ठेकेदारी भी सीख रहा है। तीन महीने बाद मुन्ना ठेकेदारी का काम भी सीख जाता है और अब वह दूसरी कंस्ट्रक्शन साइट के ठेके लेने लगता है। ठेकेदारी में वह मजदूरों को रखता है और उन मजदूरों में एक मजदूर उसका दोस्त राजू भी होता है जो उसके साथ गांव से आया था।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम कहीं पर काम करने के साथ अपनी स्किल्स को बढ़ाते हैं तो वह हमारी मूल कमाई होती है और उस समय मिलने वाला मेहनताना या पैसे एक साइड की कमाई। लेकिन, लोग इसके उल्टे को सच समझते हैं, वे स्किल को कमाई नहीं मानते। यहां 'स्किल' प्रोडक्ट हुआ और 'इनकम' बायप्रोड्क्टस।
~इंदौर के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ अबरार मुल्तानी द्वारा लिखित।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें