छह साल तक बच्चे को जो मर्जी हो वो करने दो...
उसके बाद दस साल तक उसे धीरे धीरे धैर्य के साथ चीजें सिखाओ, उदाहरण के साथ।
फिर पंद्रह साल तक उससे खूब मेहनत करवाओ और उसके बाद उसे अपना दोस्त बना लो।
लेकिन आजकल अच्छी पैरेंटिंग के नाम पर बच्चों को 'बोनसाई ' बनाने की कवायद चल रही है। दो साल की उम्र से ही उन्हे तराशते/ काटते छीलते रहो ताकि वे अच्छे तो खूब लगें लेकिन उनका आउटपुट कुछ न हो।
अच्छी पैरेंटिंग का अर्थ बच्चों स्थिर व्यक्तित्व का स्वामी बनाना होना चाहिए, उनमें सामान्य बोध, हर्ष, उल्लास, करुणा, क्रोध आदि का अतिरेक न हो, ये होना चाहिए।
वे कैसे लक्ष्य केंद्रित रहे, ये होना चाहिए।
बड़ों/ छोटों का सम्मान/ प्यार, आदि उन्हे आना चाहिए।
सबसे बड़ी बात ये कि उन्हे अपनी बात रखना आना चाहिए।
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